May

12

Thank you God

Posted By: monicagupta on May 12, 2012 at 6:22 pm

मेरी एक अन्य कविता…
Thank You God ..!!!
धन्यवाद
हे प्रभु
इतना अपनापन दिया आपने
हमने आपको
आप नही “तू” का दिया सम्बोधन
धन्यवाद हे प्रभु
तुमने जो स्रष्टि रची
फल,फूल, पौधो का दिया
नायाब उपहार
धन्यवाद हे प्रभु
तेरे उस प्रतिबिम्ब के लिए
जो तूने धरा को दिया
“नारी” के रुप मे तूने
अपनी कमी को पूरा कर दिया
धन्यवाद हे नारी !!!
कभी मां कभी बहन
कभी सच्ची दोस्त बन कर
तो कभी विदा होती बेटी बन नम कर जाती नयन
साहसी है पर भावुक क्षणो मे कमजोर भी है
पर तू ताकत है इंसा की
क्योकि
प्रतिबिम्ब है तू उस अनंत अपार का
इसलिए
धन्यवाद,हे प्रभु तेरी इस अमूल्य सरंचना का
अमूल्य उपहार का …!!!

मोनिका

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May

10

कविता … पहचान

Posted By: monicagupta on May 10, 2012 at 8:04 pm

 पहचान

 

नन्हू की चाची

दिव्या की मौसी

गीता की ताई

नीरु की आंटी

जमुना की बाई जी

दीप की भाभी

लीना की देवरानी

रानो की जेठानी

सासू माँ की बहू रानी

माँ की मोना

पति की सुनती हो

रामू की बीबी जी

मणि की मम्मी

इन नामो से मेरी

 

पहचान कही गुम हो गई

एक दिन

आईने के आगे

खुद को जानने की कोशिश की

तो

मुस्कुरा दिया आईना

और बोला

मेरी नजरो मे ना तुम

चाची हो ना ताई

ना भाभी हो ना बाई

बस

 

तुम सिर्फ तुम हो

सादगी की मूरत

दयालुता की प्रतीक

प्रेम की देवी

 

ईश्वर का प्रतिबिम्ब

 

बस …

तभी से अपने पास

आईना रखने लगी हूं

ताकि पहचान धुंधलाने पर

उसके अक्स मे खुद को जान सकू

पहचान सकू….

कि मैं भी कुछ हूं

कि मैं भी कुछ हूं ….

 

मोनिका गुप्ता 

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सिरसा 

हरियाणा 

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May

05

माँ

Posted By: monicagupta on May 5, 2012 at 12:58 pm

माँ को है 

विरह वेदना और आभास कसक का

ठिठुर रही थी वो पर

कबंल ना किसी ने उडाया

चिंतित थी वो पर

मर्म किसी ने ना जाना

बीमार थी वो पर

बालो को ना किसी ने सहलाया

सूई लगी उसे पर

नम ना हुए किसी के नयना

चप्पल टूटी उसकी पर

मिला ना बाँहो का सहारा

कहना था बहुत कुछ उसे

पर ना था कोई सुनने वाला

भूखी थी वो पर

खिलाया ना किसी ने निवाला

समय ही तो है उसके पास पर

उसके लिए समय नही किसी के पास

क्योंकि

वो तो माँ है माँ

और

माँ तो मूरत है

प्यार की, दुलार की, ममता की ठंडी छावँ की,

लेकिन

कही ना कही उसमे भी है

विरह, वेदना, तडप और आभास कसक का

शायद माँ को आज भी है इंतजार अपनो की झलक का….

 

मोनिका गुप्ता

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Apr

26

कविता

Posted By: monicagupta on April 26, 2012 at 11:56 am

मेरी एक और कविता …!!!

“कुछ देर”

मैं हंसी
तो फूल मुस्कुरा उठे
मैने छेडा तराना
तो इंद्र धनुष खिल गया
जिसकी की कामना
वही मिलती चली गई.
मन सुख सागर मे लगा गोते लगाने

चारो और खुशनुमा माहौल
लगा नई स्फूर्ति भरने
ये धरती, ये आकाश
ये चांद, ये तारे
लगे सभी
मस्ती मे झूमने

तभी
अचानक

तंद्रा टूटी मेरी
बीमार काया,खासंता शरीर,
टूटा पलंग,सूखी रसोई,
यहा गरीबी का हो रहा था तांडव

अचानक

फीकी हंसी
मेरे अधरो पर खिली
चलो
कोई नही
मेरी कल्पना तो मेरे साथ है
जब चाहे उसे नया रुप देकर खुद को बहला तो सकती हू
कुछ देर जी तो सकती हू
कुछ देर जी तो सकती हूं …!!!! :)

 

मोनिका गुप्ता 

सिरसा

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Oct

02

My blog in NBT ONLINE

Posted By: monicagupta on October 2, 2011 at 9:07 pm

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monica gupta

 

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